Vineet Sharma

लिखने और voice overs की आदत कब पड़ी ये तो याद नहीं। पर यही जरिया है दिल की बातों को कहने का सुनने का।

कई बातें समाज को लेकर उभरतीं हैं कई बातें मोहब्बत के जज़बातों को लेकर उभरतीं हैं। पर सुकून इस बात का है, की जो दिल कहना चाहता है वो कह पाता हूँ।

समाज और परिवार में कई बातें ऐसी होती हैं जब आवाज़ उठाना जरूरी हो जाता है। लेखन एक खूबसूरत जरिया है औरों से जुड़ने का।

नमश्कार मैं विनीत कुमार शर्मा लेखक और voice over artist, अपनी कविताओं और कहानियों को आप तक पहुचाने का प्रयास करता रहता हूँ। आपके सुझाव भेजते रहिए, मुझे लिखने की और श्रमता मिलती है।


ना, दर्द तो बिलकुल नहीं है

ना, दर्द तो बिलकुल नहीं है,
कतई नहीं है,
नम्ब सांसें बेफिक्र रूह,
ना किसी नाराज़गी की चर्चा,
ना तेरे डांटने की आवाज़,
सवाल इतने की लहरों की भीड़ कम लगे,
जवाब मेरे तुझे हर बार,
ओस की बूँद से लगे,
ना तब सवाल किया,
जब हम बिखर रहे थे,
ना तब किया जब जोड़ने की,
बेपनाह कोशिश किया करता था,
क्या साँसे सिर्फ मैं लेता हूँ,
तुमने कभी ना ली?
क्या सवाल सिर्फ मेरे मकसाद का है,
तुमने मोहब्बत कभी ना की?
नाराज़गी खूबसूरत लिबाज़ है,
पहन लो, ओढ़ लो,
पर इसे जिस्म का नाम ना दो,
रिश्तों को दबोच लेती है,
सुकून और अमन का,
हुक्का पानी छीन लेती है,
दिल पर हाथ रख, सोचना,
पल भर का भी सच्चा,
कभी साथ रहा हो, तो सोचना,
जो सामने था वो भी अपना था,
उसके सामने मै भी, उसका अपना था,
क्या अपना कोई कुसूरवार होता है,
क्या कोई बिन लाचारी यूँ भटकता है,

खैर ना, दर्द तो अब बिलकुल भी नहीं,
बस एक आखरी कोशिश करनी बाकि थी,
कर डाली, कतरे कतरे को,
शब्द पे पिरोने की कोशिश बाकि थी,
कर डाली,
मुस्कान तेरी सलामत रहे,
खुशियों की बौछार बरकरार रहे,
ना रास्ते कभी फिर एक हों,
ना जुबां पर तेरे,
इस दर्द नामक दोस्ती का ज़िक्र हो,
ना कोई रूबरू की बात चले,
ना कभी महफ़िल में तेरी मेरी पेशगी रहे,

मैं बस चाह कर भी,
आखरी मुलाकात को सोच ना पाउँगा,
यूँ भी डोर टूटती है,
मुस्कराहट भर बस भर पाउँगा,
ना, दर्द तो अब बिलकुल भी नहीं है,
और आखरी मिट्टी की बारी सामने आ खड़ी है,
दफ़्न करना मुनासिब तो नहीं,
पर शायद महफ़िल को मुनासिब यही होगा,
फिर नदी के पार ना जाना हो,
यही मुनासिब होगा


आघात तो मैं तब हुआ

आघात तो मैं तब हुआ,
जब मेरी बाइक को भूल,
तू उसकि कार में बैठ गयी,
पर दिल ठहरा नादान,
अगले दिन फिर तेरा इंतज़ार था,
मैं पलट कर देखता नहीं,
दिल को संभाल लेता,
पर क्या करूँ,
तुझसे नाता जुड़ गया है,
मेरे दर्द पर तेरा नाम छप गया है,
मैं चाह कर भी अश्कों को संभाल पता नहीं,
मैं अब गाड़ियों की भीड़,
रुपयों की चकाचौंद सम्भालपता नहीं,
मैंने भी ठाना है,
बस तू दर्द में रहना,
और मुझे अनगिनत कामना है,
फिर उसी मोड़ पर लौट आना है,
इस बार गाड़ी मेरी होगी,
सामने तू खड़ी होगी,
मैं पास तक तो धीरे धीरे आऊंगा,
पर तुझे देख नज़रें घुमा जाऊंगा,
पर कम्भख्त यह दिल है,
मानता कहाँ है,
देख तुझे रुकता कहाँ हैं,
बस तेरे आने भर की देरी थी,
सामने गाड़ी के front गेट से तेरी entry हो रही थी।